Sunday, July 5, 2020
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एक अशिक्षित बेटी के आंसूओं से आया मेरे जीवन में नया बिहान

मैं पूरे यकीन से कह सकती हूं कि वह दिन मेरे लिए नया बिहान था और मेरे अंदर बेटियों को शिक्षित व आत्मनिर्भर बनाने का जज्बा पैदा कर गया जब शिक्षा के सवाल को लेकर रीता के आंखों से छलके आंसुओं ने न केवल मेरे सोच की दिशा बदल दी बल्कि बेटियों को भी कमासुत पूत सरीखा बनाने की इच्छाशक्ति पैदा कर गई। समाज की आर्थिक रूप से कमजोर बेटियों को स्कूल पहुंचाने और उन्हें अभी से तकनीकी ज्ञान देकर अपने घर में कमासुत पूत जैसा ओहदा दिलाने का भी है। हमारे इस संकल्प में समाज की कई बहनें भी हमकदम-हमसाया हैं। बताते चलें, रीता हमारे घर चौका-बर्तन करने वाली सुनीता की बेटी है। घटना भले पुरानी हो लेकिन रीता जैसी बेटियों का सवाल आज भी नया है। बात उन दिनों की है जब मेरे बेटे का हाईस्कूल का रिजल्ट निकला था। मिठाई आई, सभी जी भर कर खाए। फिर सुनीता पीछे क्यों रहती। मेरा बेटा उसे दाई मां जो कहता है और वह मेरे बेटे को बाबू बुलाती है। ऐसे में भला वह अपनी खुशियां कैसे रोक पाती। बर्तन-चौका छोड़ पल्लू में हाथ पोछते जल्दी-जल्दी वह भी सामने आ खड़ी हुई। अपनी कमर पर हाथ रखते हुए प्यार भरा उलाहना उड़ेल दिया। भाभी जी मेरी मिठाई। अपनी मां की ओट लेते हुए सकुचाई, लजाई और मासूम सा चेहरा लिए उसकी 12 वर्षीय बेटी रीता भी आ खड़ी हुई। मैने मीठाई का डिब्बा जब रीता की ओर बढ़ाया तो उसने एक छोटा सा ही टुकड़ा लिया और फफक पड़ी। चूंकि रीता को मेरी नजरों ने पल-पल बढ़ते देखा है लिहाजा उसकी आंखों में आंसू मैं बर्दाश्त न कर पाई। उसके सिर पर हांथ रखा ही था कि वह मुझसे लिपट गई। बोली- आंटी जी, मैं भी पढ़ना और कुछ बनना चाहती हूं । पास खड़ी सुनीता बोल पड़ी- भाभी जी, ये प्राथमिक स्कूल जाती तो है पर वहां पढ़ाई की जगह मिड-डे मील तक ही सीमित है। जो अच्छे स्कूल हैं वहां की फीस काफी अधिक है। ऐसे हालातों में मेरे साथ काम में हाथ बंटाना ही इसकी नियति सी बनती जा रही है। सुनीता के ये अल्फाज मेरे दिल की गहराईयों तक उतर गए। पर अफसोस इस बात का है कि हम सरकारी तौर पर ऐसी व्यवस्था नहीं दे पाए जहां रीता जैसी बेटियां प्राथमिक शिक्षा की बुनियाद पर एक सुनहरे कल का तानाबाना बुन सकें।

मनीषा अग्रवाल, वाराणसी

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